तुझ संग लगन लगाई मैया, मैया ओ मेरी…

तुझ संग लगन लगाई मैया, मैया ओ मेरी।

तुझ संग लगन लगाई मैया, मैया ओ मेरी I

मैया थारे हाथों में मेहँदी रचा ऊँ,

सोणी-सोणी बाँहों में कंगना सजा ऊँ,

कजरारी आँखों में काजल लगा ऊँ,

माथे पे प्यारी-सी बिंदिया सजा ऊँ,

तू ही मेरे मन को है भायी मैया, मैया ओ मेरी II [1]

तुझ संग लगन लगाई मैया, मैया ओ मेरी I

तुने मुझे प्रेम से अपना बनाया,
भक्ति-भाव का पाठ पढ़ाया,

सुख और दुःख में साथ निभाया,

अँधियारी राहों में चलना सिखाया,

तुझ पे मैं बलिहारी मैया, मैया ओ मेरी।I [2]

तुझ संग लगन लगाई मैया, मैया ओ मेरी

भजन का भावार्थ
इस भजन का भाव अत्यंत सरल, मधुर और पूर्ण समर्पण से भरा हुआ है। इसमें एक भक्त अपनी कुलदेवी (दादीजी) के प्रति प्रेम, श्रृंगार, कृतज्ञता और पूर्ण समर्पण व्यक्त करता है।
तुझ संग लगन लगाई मैया, मैया ओ मेरी।
यह पंक्ति पूरे भजन का हृदय है। भक्त कहता है कि अब उसका मन संसार से हटकर केवल अपनी मैया में लग गया है। यह केवल श्रद्धा नहीं, बल्कि आत्मा और परम-शक्ति का गहरा प्रेम-संबंध है। अब उसके जीवन का आधार, सहारा और सबसे बड़ा प्रेम केवल उसकी कुलदेवी है।
मैया थारे हाथों में मेहँदी रचा ऊँ,
सोणी-सोणी बाँहों में कंगना सजा ऊँ।
कजरारी आँखों में काजल लगा ऊँ,
माथे पे प्यारी-सी बिंदिया सजा ऊँ।
तू ही मेरे मन को है भायी मैया, मैया ओ मेरी।
इस अंतरे में भक्त अपनी मैया का प्रेमपूर्वक श्रृंगार करने की इच्छा व्यक्त करता है।
  • “हाथों में मेहँदी रचा ऊँ” – भक्त चाहता है कि मैया के हाथ शुभता, सौभाग्य और मंगल के प्रतीक मेहँदी से सुशोभित हों।
  • “बाँहों में कंगना सजा ऊँ” – कंगन सम्मान, प्रेम और आदर का प्रतीक हैं। भक्त अपनी श्रद्धा को श्रृंगार के रूप में अर्पित करना चाहता है।
  • “कजरारी आँखों में काजल लगा ऊँ” – काजल सौंदर्य के साथ-साथ बुरी दृष्टि से रक्षा का भी प्रतीक माना जाता है।
  • “माथे पे प्यारी-सी बिंदिया सजा ऊँ” – बिंदिया देवी के दिव्य तेज, शक्ति और सौभाग्य का प्रतीक है।
भक्त कहता है—
“तू ही मेरे मन को है भायी मैया।”
अर्थात संसार की कोई वस्तु, व्यक्ति या आकर्षण अब उसे प्रिय नहीं; उसके हृदय में केवल मैया का ही निवास है।
तुझ संग लगन लगाई मैया, मैया ओ मेरी
श्रृंगार की भावना व्यक्त करने के बाद भक्त फिर अपने प्रेम की पुष्टि करता है कि उसकी लगन केवल मैया से है और सदा रहेगी।
“तुने मुझे प्रेम से अपना बनाया,
भक्ति-भाव का पाठ पढ़ाया।
सुख और दुःख में साथ निभाया,
अँधियारी राहों में चलना सिखाया।
तुझ पे मैं बलिहारी मैया, मैया ओ मेरी।”

इस अंतरे में भक्त अपनी मैया, दादीजी के उपकारों को याद करता है।

  • तुने मुझे प्रेम से अपना बनाया” – मैया ने बिना किसी भेदभाव के अपने स्नेह से भक्त को स्वीकार किया।
  • “भक्ति-भाव का पाठ पढ़ाया” – जीवन में सच्ची भक्ति, विनम्रता और सेवा का मार्ग मैया ने ही दिखाया।
  • “सुख और दुःख में साथ निभाया” – अच्छे और कठिन दोनों समयों में मैया ने कभी साथ नहीं छोड़ा।
  • “अँधियारी राहों में चलना सिखाया” – जब जीवन में भ्रम, दुख या कठिनाइयाँ आईं, तब मैया ने सही मार्ग दिखाया और हिम्मत दी।

फिर भक्त कहता है—

“तुझ पे मैं बलिहारी मैया।”

अर्थात मैं अपना तन, मन, धन और सम्पूर्ण जीवन आपकी कृपा पर न्योछावर करता हूँ। यह पूर्ण समर्पण और कृतज्ञता की चरम अभिव्यक्ति है।