जीवन का वास्तविक उद्देश्य – ईश्वर प्राप्ति

गीता अध्याय 8, श्लोक 5 में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥
अर्थात्—
जो पुरुष अन्तकाल में मेरा ही स्मरण करते हुए शरीर का त्याग करता है, वह मेरे स्वरूप को ही प्राप्त होता है। इसमें तनिक भी संशय नहीं है।
भगवान आगे कहते हैं—
यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥
अर्थात्—
हे अर्जुन! मनुष्य अन्त समय में जिस-जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर का त्याग करता है, वह उसी भाव को प्राप्त होता है।
यदि अन्त समय में भगवान का स्मरण हो सके, तो इसके लिए आवश्यक है कि हम अपने सम्पूर्ण जीवनकाल में निरन्तर उनका स्मरण करते रहें। इसी उद्देश्य से भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं—
तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥
अर्थात्—
हे अर्जुन! तुम प्रत्येक समय मेरा स्मरण करते हुए अपना कर्तव्य अर्थात् युद्ध भी करो।
यदि एकदम से ऐसा न हो सके, तो उसका अभ्यास करो। परन्तु अभ्यास करने से पहले सही मार्ग को जानना आवश्यक है।
इसीलिए संत नामदेव जी कहते हैं—
उठत, बैठत, सोवत, जागत नाम।
कहत नामदेव, सिद्ध गए तिनके काम॥
अर्थात् उठते, बैठते, सोते, जागते तथा चलते-फिरते हर समय भगवान के नाम का स्मरण करो। आज जो कार्य तुम करते हो, उसे बार-बार करने से उसका अभ्यास हो जाता है। उसी प्रकार यदि तुम निरन्तर भगवान के नाम का स्मरण करने का अभ्यास करोगे, तो अन्त समय में भी सहज ही भगवान का स्मरण होगा।
इसी कारण भगवान तथा सभी संत-महात्मा निरन्तर नाम-स्मरण करने का उपदेश देते हैं। जब तुम्हारा चित्त सदैव भगवान में लगा रहेगा, तब जिस समय और जहाँ भी तुम्हारा शरीर छूटेगा, तुम भगवान को ही प्राप्त हो जाओगे।
कबीर साहब भी कहते हैं—
तंत्र-मंत्र सब झूठ है, मत भरमो संसार।
सार शब्द जाने बिना, कोई न उतरे पार॥
शब्द बिना सुरति भटके, कहो कहाँ को जाय।
द्वार न पावे शब्द का, फिर-फिर भटका खाय॥
अर्थात् तंत्र-मंत्र आदि में उलझे रहना व्यर्थ है। यदि मनुष्य को परम सत्यरूप सार-शब्द का ज्ञान नहीं है, तो वह भवसागर से पार नहीं हो सकता।
मान लो कि कोई व्यक्ति मृत्यु के समय जप भी कर ले, तो भी यह निश्चित नहीं कि उसका मन भगवान में स्थिर रहेगा। यदि मन का वास्तविक आधार ज्ञात ही नहीं है, तो उसे कहाँ और कैसे स्थिर करोगे? इसलिए पहले सत्य को जानो। अभी मानव-जीवन मिला है; इसी जीवन में सच्ची वस्तु का ज्ञान प्राप्त करके उसमें मन को स्थिर करने का अभ्यास कर लो। तब अन्त समय में शरीर छोड़ते हुए तुम भगवान को ही प्राप्त हो जाओगे।
इसी बात को भगवान गीता अध्याय 8, श्लोक 8 में अर्जुन से कहते हैं—
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥
फिर गीता अध्याय 7, श्लोक 2 में भगवान कहते हैं—
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥
अर्थात्—
हे अर्जुन! अब मैं तुम्हें ज्ञान और विज्ञान सहित ऐसा परम रहस्य बताऊँगा, जिसे जान लेने के बाद इस संसार में जानने योग्य कुछ भी शेष नहीं रह जाएगा।
तीन प्रकार के मनुष्य
देखो, मनुष्यों के मुख्यतः तीन प्रकार होते हैं— उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ।
उत्तम पुरुष हंस के समान होते हैं। जैसे हंस दूध और पानी के मिश्रण में से केवल दूध ग्रहण कर लेता है और पानी छोड़ देता है, वैसे ही उत्तम पुरुष संसार में रहते हुए भी केवल सार-तत्त्व को ग्रहण करते हैं और असार वस्तुओं का त्याग कर देते हैं।
मध्यम पुरुष बगुले के समान होते हैं। वे सार और असार—दोनों को अपने भीतर स्थान देते हैं तथा विवेक का पूर्ण उपयोग नहीं कर पाते।
तीसरे प्रकार के मनुष्य कनिष्ठ श्रेणी के होते हैं। वे छलनी के समान होते हैं। जिस प्रकार छलनी सार वस्तु अर्थात् आटे को बाहर गिरा देती है और असार वस्तुएँ, जैसे मिट्टी, कंकड़ और पत्थर, अपने भीतर रख लेती है, उसी प्रकार कनिष्ठ व्यक्ति भी दूसरों के अवगुणों को ही देखते और ग्रहण करते हैं। उनके गुणों पर उनकी दृष्टि नहीं जाती।
अतः मनुष्य की मनोवृत्ति हंस के समान होनी चाहिए, छलनी के समान नहीं।
संसार में जितने भी संत, महर्षि और ऋषि हुए हैं, वे सभी सुमिरण के मार्ग पर चले हैं। यही वास्तविक धर्म है। धर्म का अर्थ किसी संप्रदाय विशेष से नहीं, बल्कि उस सत्य को धारण करने से है, जो जीवन का आधार है।
सच्चा धर्म एक ही है। वही समस्त जीवन का आधार है और उसी के कारण शरीर में चेतना विद्यमान रहती है। उसी के अभाव में शरीर निर्जीव हो जाता है। यह धर्म हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी आदि सभी के लिए समान है; इसमें किसी प्रकार का भेद नहीं है। इसलिए सबसे पहले उस सनातन और शाश्वत धर्म को जानना आवश्यक है।
परम पिता की प्राप्ति
परम पिता को प्राप्त किया जा सकता है। महात्मा बुद्ध को भी इसी दिव्य ज्योति का बोध हुआ था। तत्पश्चात उन्होंने अपने संपूर्ण जीवनकाल में इसी सत्य का उपदेश जन-जन को दिया।
कबीर साहब ने भी इस नूर, ज्योति और सत्यनाम का वर्णन करते हुए इसे अत्यंत गुप्त बताया है—
कोटि नाम संसार में, ताते मुक्ति न होय।
आदि नाम जो गुप्त जप, बूझे विरला कोय॥
अर्थात् संसार में असंख्य नाम प्रचलित हैं, परंतु उनसे मुक्ति नहीं मिलती। जो साधक गुप्त आदि-नाम का जप करता है, उसका रहस्य कोई विरला ही जान पाता है।
महावीर स्वामी ने भी ओंकार और बिंदु-नाम का साधन करके उसी परम सत्य का अनुभव किया तथा लोगों को उसका उपदेश दिया।
गुरु नानक देव जी ने भी सत्यनाम का महत्त्व बताते हुए कहा है—
आदि सच, जुगादि सच।
है भी सच, नानक होसी भी सच॥
इसी दिव्य ज्योति के लिए उन्होंने ‘चानण’ (प्रकाश) शब्द का प्रयोग किया है—
जै सौ चंदा उगवैं, सूरज चढ़ैं हजार।
एते चानण होदिआ, गुरु बिनु घोर अंधार॥
अर्थात् यदि सैकड़ों चंद्रमा उदित हो जाएँ और हजारों सूर्य भी प्रकाशित हो जाएँ, तब भी सद्गुरु के ज्ञान के बिना घोर अंधकार ही बना रहता है।
उन्होंने आगे कहा है—
एको सुमिरो नानका, जल थल रहियो समाय।
दूजा काहे सुमिरिए, जमते ही मर जाय॥
अर्थात् उसी एक परमात्मा का स्मरण करो, जो जल, थल, पृथ्वी, आकाश तथा समस्त सृष्टि में व्याप्त है। वही सनातन है, उसका कभी नाश नहीं होता। उसी का निरंतर स्मरण करना चाहिए। उसका स्मरण प्रत्येक समय और प्रत्येक कार्य करते हुए भी किया जा सकता है।
इसके विपरीत, तंत्र-मंत्र आदि का प्रभाव केवल तब तक रहता है, जब तक उनका उच्चारण किया जाता है। उच्चारण बंद होते ही उनका प्रभाव भी समाप्त हो जाता है। इसलिए वे उत्पन्न होकर नष्ट होने वाले हैं।
परंतु परमात्मा अविनाशी है। सभी संतों और महापुरुषों ने उसी एक परम सत्य का स्मरण और भजन करने का उपदेश दिया है। उन्होंने कहा है कि अपनी चित्तवृत्तियों को उसी परमात्मा में लगाओ। ऐसा करने से मनुष्य इस संसार-सागर से पार हो सकता है।
वास्तव में सच्चा धर्म सबके लिए एक ही है। सभी महापुरुषों ने निरंतर, निष्काम और अखंड रूप से परमात्मा का स्मरण करने तथा अपनी चित्तवृत्ति को उसी में स्थिर करने का उपदेश दिया है। यही मानव जीवन का परम उद्देश्य और सच्चे धर्म का सार है।
गीता अध्याय 8, श्लोक 5 में भगवान कहते हैं कि—
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥ (गीता 8.8)
अर्थात—इस संसार में जिसकी श्रद्धा नहीं है, विश्वास नहीं है, वह मुझे कभी प्राप्त नहीं कर सकता। वह मृत्यु-रूप संसार-चक्र में सदा भ्रमण करता रहता है। यह भगवान का वचन है। इसलिए श्रद्धा आवश्यक है। इसी श्रद्धा से मनुष्य भगवान को प्राप्त करने का अधिकारी बनता है।
फिर देखिए, गीता अध्याय 11 के श्लोक 48 और 53—
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः।
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर॥ 11 I 48
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया।
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा॥ 11 I 53
इन दोनों श्लोकों में भगवान दो बार कहते हैं कि वेदों का अध्ययन करने, यज्ञ करने, हवन करने, दान-पुण्य करने अथवा उग्र तप करने से मेरा तत्त्वज्ञान प्राप्त नहीं हो
हमें विचार करना चाहिए कि यदि केवल वेदों का अध्ययन कर लेने से ही परमात्मा का ज्ञान हो जाता, तो भगवान ऐसा क्यों कहते? यदि बड़े-बड़े यज्ञ कर लिए जाएँ, अथवा यज्ञ-सामग्री पर असीम धन व्यय कर दिया जाए, तो क्या उससे परमात्मा का ज्ञान हो जाएगा? यदि हीरे-मोती, सोना आदि का दान दिया जाए, तो क्या उससे परमात्मा का ज्ञान प्राप्त हो जाएगा? नहीं।
कुछ लोगों की यह धारणा है कि वेदों में सब कुछ है। परंतु पहले यह समझना चाहिए कि वेदों में सब कुछ प्रत्यक्ष रूप से नहीं है। वहाँ अनेक बातों का केवल उल्लेख किया गया है। उदाहरण के लिए, आयुर्वेद में अनेक जड़ी-बूटियों के नाम दिए गए हैं, परंतु क्या वे जड़ी-बूटियाँ पुस्तक के भीतर मिल जाती हैं? नहीं, उन्हें बाहर से लाना पड़ता है।
इसी प्रकार हवन की सामग्री—जैसे बबूल की लकड़ी, पीपल की लकड़ी, घी, तिल आदि—का केवल उल्लेख किया गया है। क्या ये वस्तुएँ वेदों के भीतर हैं? नहीं, इन्हें भी बाहर से ही लाना पड़ता है।
इसी प्रकार गीता के विभूति योग अध्याय में भगवान कहते हैं—”नदियों में मैं गंगा हूँ और पर्वतों में हिमालय हूँ।” इसका अर्थ यह नहीं कि गंगा और हिमालय गीता के भीतर हैं; गीता में तो केवल उनका उल्लेख है। उसी प्रकार वेदों में भी केवल वर्णन है; परमात्मा का साक्षात् ज्ञान केवल वेद पढ़ लेने से प्राप्त नहीं होता I
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 18, श्लोक 55)
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥
भावार्थ :
हे अर्जुन! अनन्य भक्ति के द्वारा ही मेरा यथार्थ स्वरूप जाना जा सकता है। जब साधक मुझे तत्त्व से जान लेता है, तब वह अंततः मेरे स्वरूप में स्थित हो जाता है।
सरल व्याख्या :
हे अर्जुन! अनन्य भक्ति से ही मेरा वास्तविक ज्ञान प्राप्त होता है। इसलिए पहले यह समझना आवश्यक है कि भक्ति क्या है।
देखिए, जिस किसी वस्तु, व्यक्ति या रूप में हम भगवान का भाव कर लेते हैं, कुछ समय के लिए वही हमारे लिए भगवान का स्वरूप बन जाता है। जब हमारा चित्त उस स्वरूप से जुड़ जाता है, तभी भक्ति का आरम्भ होता है। अर्थात्, अपने मन और चित्त को श्रद्धा एवं प्रेमपूर्वक भगवान से जोड़ देना ही सच्ची भक्ति है।
अनन्य भक्ति का अभ्यास और सद्गुरु की आवश्यकता
यहाँ उपास्य परमात्मा हैं और उपासक हम हैं। अपने चित्त को परमात्मा में एकाग्र कर देना ही उपासना है। परमात्मा हमारे ध्येय हैं और हम उनके ध्याता। जब यह स्थिति निरन्तर बनी रहती है, तभी उसे अनन्य भक्ति कहा जाता है।
यदि हमारा चित्त बार-बार संसार की ओर चला जाता है और परमात्मा में स्थिर नहीं हो पाता, तो भगवान श्रीकृष्ण अभ्यास का मार्ग बताते हैं। वे कहते हैं कि निरन्तर अभ्यास से चित्त धीरे-धीरे परमात्मा में स्थिर होने लगता है। यद्यपि यह साधना सरल नहीं है, फिर भी सतत प्रयास और दृढ़ संकल्प से साधक अन्ततः अपने लक्ष्य तक पहुँच जाता है।
किन्तु प्रश्न यह है कि अभ्यास किसका किया जाए? जब तक साधक अपने ध्येय को जानता ही नहीं, तब तक उसका ध्यान किस पर लगाएगा? जिस वस्तु का परिचय ही न हो, उसके प्रति मन कैसे एकाग्र होगा? इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने अनन्य भक्ति का उपदेश देने से पहले ज्ञान की अनिवार्यता पर बल दिया है।
इसी उद्देश्य से श्रीमद्भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय के 34वें श्लोक में भगवान कहते हैं—
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥
अर्थात् तत्त्वदर्शी महापुरुषों के पास जाओ। श्रद्धा और विनम्रता के साथ उन्हें प्रणाम करो, निष्कपट भाव से उनकी सेवा करो तथा आदरपूर्वक उनसे जिज्ञासा करो। वे तत्त्वदर्शी ज्ञानीजन तुम्हें उस परम सत्य का ज्ञान प्रदान करेंगे, जिसे उन्होंने स्वयं अनुभव किया है।
अब प्रश्न उठता है कि वे तत्त्वदर्शी महापुरुष क्या बताते हैं? इसका उत्तर भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय के आठवें श्लोक में देते हैं—
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्॥
अर्थात्—”तुम मुझे इन सामान्य नेत्रों से नहीं देख सकते। इसलिए मैं तुम्हें दिव्य चक्षु प्रदान करता हूँ; अब मेरे योग-ऐश्वर्य का दर्शन करो।”
स्पष्ट है कि परमात्मा का वास्तविक स्वरूप सामान्य इन्द्रियों से नहीं जाना जा सकता। उसके लिए दिव्य दृष्टि, तत्त्वज्ञान तथा सद्गुरु के उपदेश की आवश्यकता होती है। जब साधक तत्त्वदर्शी गुरु के मार्गदर्शन में साधना करता है, तभी उसकी भक्ति दृढ़ होती है और उसका चित्त परमात्मा में स्थिर होकर परम लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है।
अर्थात् तू मुझे इन सामान्य प्राकृत नेत्रों द्वारा नहीं देख सकता। इसलिए मैं तुझे दिव्य, अर्थात् अलौकिक नेत्र प्रदान करता हूँ।
इन बाह्य नेत्रों से केवल माया दिखाई देती है, माया का शरीर दिखाई देता है। आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, मन, बुद्धि और अहंकार से निर्मित यह शरीर दिखाई देता है। परन्तु भगवान् कहते हैं—मैं शरीर नहीं हूँ; मैं शरीर में स्थित सच्चिदानन्द स्वरूप आत्मतत्त्व हूँ। मेरे वास्तविक स्वरूप का प्रभाव इन सामान्य आँखों से नहीं देखा जा सकता। इसलिए भगवान् ने अर्जुन को ज्ञान-नेत्र प्रदान किए और अपने विराट विश्वरूप का दर्शन कराया, जो सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है।
परम प्रकाश का स्वरूप
यदि करोड़ों सूर्य एक साथ उदित हो जाएँ, तब भी वे उस परम प्रकाश की बराबरी नहीं कर सकते। उस दिव्य प्रकाश का वर्णन अनेक संतों और शास्त्रों में मिलता है।
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 11, श्लोक 12) में कहा गया है—
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः॥
अर्थात् यदि आकाश में हजारों सूर्य एक साथ उदित हो जाएँ, तो भी वे उस दिव्य प्रकाश की तुलना नहीं कर सकते।
इसी प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 15, श्लोक 6) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥
अर्थात् जहाँ सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि अथवा बिजली का प्रकाश भी आवश्यक नहीं है, क्योंकि वहाँ स्वयं दिव्य ज्योति विद्यमान है। उस परम धाम को प्राप्त करने के बाद जीव पुनः संसार में नहीं लौटता।
गुरु नानक देव जी ने भी कहा है—
“ज्योति में ज्योति समानी।”
अर्थात् जब जीव अपनी वास्तविक सत्ता का बोध कर लेता है और उस परम ज्योति का निरंतर अभ्यास करता है, तब वह उसी दिव्य ज्योति में लीन हो जाता है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा है—
राम भगति चिन्तामणि सुंदर, बसै गरुड़ जाके उर अंदर।
परम प्रकाश रूप दिन राती, नहिं चाहिअ दिया घृत बाती॥
अर्थात् जहाँ रामभक्ति रूपी चिन्तामणि हृदय में विराजमान होती है, वहाँ दिन-रात परम प्रकाश का अनुभव होता है। वहाँ दीपक, घी अथवा बाती की आवश्यकता नहीं रहती।
अतः हमें उस परम प्रकाश का निरंतर स्मरण और अभ्यास करना चाहिए। मन और बुद्धि को उसी दिव्य ज्योति में स्थिर करने का प्रयास करना चाहिए, ताकि शरीर का अंत होने पर जीव उसी परम ज्योति में लीन हो जाए और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त होकर मानव जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त कर सके।
चार प्रकार की रोशनियाँ
बाइबल में प्रभु ईसा मसीह के संबंध में कहा गया है कि चार प्रकार की रोशनियाँ होती हैं—सूर्य की रोशनी, चन्द्रमा की रोशनी, अग्नि की रोशनी तथा चौथी दिव्य आध्यात्मिक रोशनी। पहली तीन प्रकार की रोशनियों को तो प्रत्येक व्यक्ति देख सकता है, किन्तु जो उस चौथी दिव्य ज्योति का साक्षात्कार कर लेता है, वही वास्तविक अर्थों में ज्ञानी कहलाता है।
यही सत्य हमारे सनातन शास्त्रों में भी अत्यन्त स्पष्ट रूप से वर्णित है—
आहारनिद्रा भय मैथुनं च समानं पशुभिर्नराणाम्।
ज्ञानं नराणामधिको विशेषो ज्ञानेन हीनाः पशुभिः समानाः॥
भावार्थ— भोजन करना, निद्रा लेना, भय अनुभव करना तथा मैथुन करना—ये चारों प्रवृत्तियाँ मनुष्य और पशु दोनों में समान रूप से पाई जाती हैं। मनुष्य को पशु से श्रेष्ठ बनाने वाला एकमात्र गुण ज्ञान है। यदि किसी व्यक्ति में ज्ञान का अभाव है, तो वह पशु के समान ही माना जाता है।
महाकवि सूरदास जी भी इसी सत्य को अपने पदों में अत्यन्त मार्मिक ढंग से व्यक्त करते हैं—
मो सम कौन कुटिल खल कामी।
जिन सुंदर तन दियो ताहि बिसरायो, ऐसो नमकहरामी॥
भरि-भरि उदर विषय को धावत, जैसे सूकर ग्रामी॥
और आगे वे कहते हैं—
हरिजन छाँड़ि हरि-विमुखन की निसि-दिन करत गुलामी।
सूर पतित को ठौर कहाँ है, सुनिए श्रीपति स्वामी॥
यह पद हमें स्मरण कराता है कि यदि मनुष्य अपने अमूल्य जीवन को केवल भौतिक सुखों और विषय-वासनाओं में व्यतीत कर दे तथा ईश्वर-स्मरण और आत्मज्ञान से विमुख हो जाए, तो उसका जीवन अपने वास्तविक उद्देश्य से भटक जाता है।
अस्वीकरण (Disclaimer)
इस लेख में प्रस्तुत श्लोक, भावार्थ एवं व्याख्या का उद्देश्य केवल आध्यात्मिक अध्ययन, सत्संग एवं जन-जागरण है। व्याख्या विभिन्न वैदिक ग्रंथों, संत-महात्माओं के विचारों तथा लेखक की समझ पर आधारित है। किसी भी विषय में अंतिम प्रमाण श्रीमद्भगवद्गीता, वेद, उपनिषद् एवं सद्गुरु के उपदेश ही माने जाएँ।
यदि किसी पाठक की धार्मिक मान्यता, परंपरा या व्याख्या इससे भिन्न हो, तो उसका पूर्ण सम्मान किया जाता है।
॥ जय दादीजी ॥